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जन्माष्टमी ज्योतिष

जन्माष्टमी — भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का पावन पर्व। ज्योतिषीय दृष्टि से, यह दिन रोहिणी नक्षत्र, अष्टमी तिथि और मध्यरात्रि का संयोग — अत्यंत दुर्लभ और श...

जन्माष्टमी — भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का पावन पर्व। ज्योतिषीय दृष्टि से, यह दिन रोहिणी नक्षत्र, अष्टमी तिथि और मध्यरात्रि का संयोग — अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली।

जन्माष्टमी का ज्योतिषीय महत्व

श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि को हुआ था। यह संयोग 'जयंती योग' कहलाता है। इस रात की पूजा का फल हजारों एकादशी व्रतों के बराबर।

रोहिणी नक्षत्र का महत्व

रोहिणी चंद्रमा का प्रिय नक्षत्र है — सौंदर्य, समृद्धि और प्रेम का प्रतीक। श्रीकृष्ण के जन्म-नक्षत्र होने से यह नक्षत्र विशेष रूप से शुभ। इस नक्षत्र में जन्मे लोग कलात्मक, आकर्षक और भाग्यशाली होते हैं।

व्रत और पूजन विधि

दिन भर उपवास। रात्रि 12 बजे श्रीकृष्ण की पूजा — दूध, दही, माखन, मिश्री का भोग। पंचामृत स्नान। नंदलाल झूले का आरंभ। 'गोविंदा' कीर्तन। रात्रि जागरण।

सभी राशियों के लिए जन्माष्टमी

मेष: साहस के साथ भक्ति। वृषभ: रास नृत्य का आनंद। मिथुन: कथा-गायन। कर्क: मातृ-भक्ति। सिंह: नेतृत्व के साथ भक्ति। कन्या: सेवा-भाव से पूजा। तुला: सौंदर्य से भगवान को सजाएं। वृश्चिक: गहन ध्यान। धनु: ज्ञान-यज्ञ। मकर: अनुशासित व्रत। कुंभ: सामूहिक कीर्तन। मीन: आध्यात्मिक रसानुभूति।

कृष्ण मंत्र और स्तुति

मूल मंत्र: 'ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा'। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'। हरे कृष्ण महामंत्र। गीता पाठ अति शुभ।