विवाह का समय कुंडली के 7वें भाव, उसके स्वामी, गुरु-शुक्र की स्थिति, और चल रही दशा-गोचर के आधार पर निर्धारित होता है। आइए...
विवाह का समय कुंडली के 7वें भाव, उसके स्वामी, गुरु-शुक्र की स्थिति, और चल रही दशा-गोचर के आधार पर निर्धारित होता है। आइए विस्तार से समझें।
विवाह योग देखने के लिए मुख्य कारक: (1) 7वां भाव और उसका स्वामी (2) शुक्र (पुरुष के लिए), गुरु (स्त्री के लिए) (3) सप्तमेश की स्थिति और दृष्टि (4) नवांश कुंडली में 7वां भाव (5) गोचर में गुरु का संबंध
21-25 वर्ष: यदि शुक्र/गुरु बलवान, सप्तमेश शुभ ग्रह से दृष्ट। 25-30 वर्ष: सामान्य योग, सप्तमेश की दशा। 30-35 वर्ष: सप्तमेश पाप ग्रह से दृष्ट या कमजोर। 35+ वर्ष: मांगलिक दोष, सप्तमेश 6/8/12 में, या शनि का प्रभाव।
विवाह सामान्यतः सप्तमेश की दशा, 7वें भाव में स्थित ग्रह की दशा, या शुक्र/गुरु की दशा-अंतर्दशा में होता है। राहु-केतु की दशा में कभी-कभी अप्रत्याशित विवाह।
बृहस्पति का 7वें भाव या 7वें स्वामी पर गोचर शुभ माना जाता है। साडे साती की समाप्ति के बाद, राहु की महादशा के परिवर्तन पर विवाह की संभावना बढ़ती है।
गुरुवार को व्रत, गुरु मंत्र: 'ॐ बृं बृहस्पतये नमः'। शुक्रवार को मां लक्ष्मी पूजा। पीपल वृक्ष की पूजा। कन्या दान या भोजन कराना। हल्दी की गांठ दाहिनी जेब में।
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